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जागतिक वसुंधरा दिन की शुरुआत कब और क्यो?

जागतिक वसुंधरा दिन 22 अप्रैल 



national earth day

 मानव जाति की शुरुआत में अन्न,वस्त्र, निवारा यह सीमित आवश्यकताएं थी। धीरे धीरे मानव की आवश्यकताएं बढ़ती गई। मानव विकास और उसकी सौंदर्य कल्पनाओं का परिणाम पर्यावरण संतुलन पर दिख रहा है। हमारी आंखों को सुंदर दिखने वाला पर्यावरण मानव जाति के भविष्य पर बुरा असर डालने वाला है। मानव जाति की स्वार्थ बुद्धि की वजह से ही आज संपूर्ण दुनिया इसकी कीमत चुका रहा है। खुद को बड़ा समझने वाला इंसान आज कोरोना जैसी महामारी से खुद ही घरों में कैद हो गया है।  यह भी इंसान की स्वार्थ बुद्धि और लालच का ही नतीजा है।


    हम हर साल 'जागतिक वसुंधरा दिन'मनाते हैं। इस समय हम अपनी पृथ्वी की रक्षा करने की शपथ लेते हैं पेड़ पौधे लगाते हैं सेल्फी निकालते हैं और अपने अपने काम पर लग जाते हैं। दिन खत्म होते ही वसुंधरा का महत्व भी खत्म हो जाता है और फिर याद आती है अगले साल । 364 दिन हम अपने पर्यावरण का भरपूर शोषण करते हैं। वसुंधरा का अर्थ होता है पृथ्वी और हमारी संस्कृति में पृथ्वी को माता मानते हैं। उसकी पूजा करते हैं। लेकिन यह संस्कृति आज केवल किताबों में ही कैद है या फिर सोशल मीडिया पर फोटो शेयर करने तक ही सीमित हो चुकी है।

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  हमारे व्यस्त जीवन में वसुंधरा या पर्यावरण के लिए हमारे पास समय नहीं है। विकास के नाम पर मानव ने पृथ्वी का सुंदर रूप विद्रूप कर दिया है। मानव विकास की संकल्पना में सिर्फ मानव ही विकास का केंद्र बिंदु है जो करना है वह  सिर्फ मानव हित में ही हो, फिर चाहे पशु पक्षी पेड़ पौधे और अन्य जीव नष्ट ही क्यों ना हो जाए। क्षणिक सुख के लिए हम अपना भविष्य ही दाव पर लगा रहे हैं यह किसी ने सोचा भी नहीं। आज हमें बड़ी बड़ी इमारते चाहिए, बड़े रेलवे मार्ग चाहिए, बड़े-बड़े महामार्ग चाहिए, लेकिन यह करते समय पृथ्वी की कितनी हानि होती है यह किसी ने सोचा भी नहीं।
जागतिक वसुंधरा दिन

  मानव की यह गतिविधियां ही मानव के लिए खतरा बनता जा रहा है लेकिन इसकी और किसी का ध्यान भी नहीं जाता। आज विकास के नाम पर पेड़ पौधे तोड़े जा रहे और उनकी जगह बड़ी-बड़ी सीमेंट की इमारते खड़ी की जा रही है। बीते कई साल विकास की मूर्ख कल्पनाएं वास्तव में लाने के प्रयत्न में हमने अपनी ही वसुंधरा का इतना नुकसान कर दिया है कि आने वाले समय में पृथ्वी पर जीवन नष्ट होने का ही खतरा उत्पन्न हो चुका है।

 मानव ने स्वार्थ की वजह से आज जल हवा वायु प्रदूषित कर दिया है। अनगिनत पेड़ों को तोड़कर जल स्त्रोत ही नष्ट कर दिया है। अभी तो अप्रैल शुरू है और मई बाकी है लेकिन अभी से ही तापमान इतना बढ़ चुका है कि आने वाले दिनों में तापमान कितना बढ़ेगा यह सोच भी नहीं सकते। अगले साल क्या होगा यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जनवरी-फरवरी में अकाल कुए नदी तालाब सुख जाना पानी की खोज में दूर दूर तक जाना शहरों में पानी टंचाई फिर और गहरे बोरवेल बनाना नजर पहुंची वहां तक इमारत ही नजर आती है और पेड़ों का कुछ पता ही नहीं। फरवरी अप्रैल के बीच में ही देश के सामने पानी का खतरा उत्पन्न ना हो जाता है।


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 सौंदर्यीकरण के नाम पर विदेशी पेड़ों को लगाकर पर्यावरण का नुकसान हुआ है। ऑस्ट्रेलिया से नीलगिरी के पेड़ मादागास्कर से लाए गए गुलमोहर 70 के दशक में आयात किए गए गेहूं के साथ आए पेलट्रो फोरम, अकेशिया, स्पेथोडीया, कॅशिया, ग्लिरिसिडिया, फायकस, सप्तपर्णी रेनट्री इन पेड़ों ने हमारी हजारों एकड़ जमीन बर्बाद कर दिया है। यह विदेशी पेड़ और गाजर घास हमारे पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन चुके हैं। बड़ी महा मार्गों के दोनों तरफ यह पेड़ बहुत ज्यादा तादाद में दिखाई पड़ते हैं। हमारे जमीन का पानी यह पेड़ ज्यादा मात्रा में आकर्षित कर लेते हैं और इनका हमारे पर्यावरण के लिए बहुत ज्यादा उपयोग नहीं है। लेकिन हमारी आंखों को अच्छा लगता है इसलिए हम यह पेड़ लगाते हैं जबकि यह पशु पक्षियों को भी आकर्षित नहीं कर सकते हैं।

  आज विकास के नाम पर हमने जो पर्यावरण का नाश किया है उसका परिणाम मानव जाति पर और पर्यावरण पर दिखाई दे रहा है। मुंबई जैसे बड़े महानगरों में खेती योग्य जमीन इमारतों के लिए बर्बाद कर दिया है इस कारण यहां की जैव विविधता नष्ट हो चुकी है। हम पर्यावरण से संबंधित बड़े-बड़े उत्सव आयोजित करते हैं लेकिन वह सीमित रहता है।

  इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की बिक्री भी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इस वजह से इ-वेस्ट की भयंकर समस्या उत्पन्न हो चुकी है। ई वेस्ट की वजह से जल प्रदूषण वायु प्रदूषण और जमीन का प्रदूषण हो रहा है।





  हमारे आसपास हर रोज पर्यावरण का नाश होता है और इसमें सरकार भी भागीदार है। इस समस्या को रोकने के लिए कुछ सामाजिक संस्थाएं पर्यावरण रक्षण के लिए प्रयास कर रहे हैं। अपनी पृथ्वी जैव विविधता और नैसर्गिक स्त्रोतों को बचाने का यथासंभव प्रयास कर रहे हैं।


 एक दिन के प्रयास से यह परिस्थिति सुधारने वाली नहीं है इसके लिए हमें हमेशा प्रयासरत रहना पड़ेगा। इसके लिए सामाजिक संस्थाएं सरकार और हमने मिलकर  प्रयास करना जरूरी है। हमें जो नैसर्गिक विरासत मिली है वह हमें हमाारी पिछली पीढ़ी की तरफ से मिली है। अब हमारा भी यह कर्तव्य हैै कि हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए हमने मिलकर पर्यावरण की रक्षा करना जरूरी है।




जाने वसुंधरा दिन के बारे में



जागतिक वसुंधरा दिन


  जागतिक वसुंधरा दिन पर्यावरण विषयक कार्यक्रमों को जागृत रखने का स्त्रोत है। इस दिन को मनाने का मकसद यही है कि संपूर्ण विश्व में लोगों में पर्यावरण संबंधी और अपनी पृथ्वी संबंधी जागरूकता निर्माण हो सके।
  
  पिछले 45 सालों से हर साल 22 अप्रैल को जागतिक वसुंधरा दिन के नाम से मनाया जाता है। सन 1970 के दशक में आधुनिक पर्यावरण मूवमेंट का जन्म यह दिन मनाने से ही हुआ है ऐसे बहुत से लोग मानते हैं। उस समय अमेरिकन लोग वी 8 सेडन इस बड़े वाहन का उपयोग करते थे। इस वाहन से निकलने वाला धुआं बड़ी मात्रा में वायु प्रदूषण करता था। कारखानों में से भी निकलने वाला धुआं और बिना किसी प्रक्रिया किए रसायन मिश्रित पानी बड़ी मात्रा में वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार थे। उन्हें कानून या मीडिया  का कोई डर नहीं था। जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण को उस समय समृद्धि का प्रतीक ही माना करते थे।

  उस समय पर्यावरण शब्द अलग ही अर्थ से लिया जाता था। पर्यावरण की चिंता किसी को भी नहीं थी। लेकिन सन 1962 में सागरी जीवशास्त्रज्ञ राचेल कार्सन लिखित साइलेंट स्प्रिंग यह किताब न्यूयॉर्क टाइम्स ने प्रकाशित की और इसी किताब की वजह से लोगों में पर्यावरण संबंधी जागृति होना शुरू हो गई। 24 देशों में इस किताब की 5 लाख प्रतियां बिक गई। इस किताब की माध्यम से कार्सन ने सजीव पर्यावरण और सार्वजनिक आरोग्य संबंध में की गई जागृति अन्य किसी व्यक्ति की तुलनाा में अधिक थी। इस बढ़ती जागृति में से ही 1970 में "वसुंधरा दिन" मनाने की कल्पना नेे जन्म लिया। वसुंधरा दिन मनाने की कल्पना सबसे पहले "गेलॉर्ड नेल्सन" ने रखी। नेल्सन उस समय अमेरिका के "विस्कॉन्सिन" राज्य के सीनेटर थे।



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